Saturday, January 19, 2008
Thursday, December 27, 2007
Wednesday, August 8, 2007
१०-- मेरी रानी की कहानी
१०-- मेरी रानी की कहानी
यह घटना है सन् १९८३ की। तब मेरी पोस्टिंग महाराष्ट्र के सांगली जिले में जिला परिषद् की प्रमुख कार्यकारी अधिकारी के पद पर हुई थी। महाराष्ट्र प्रशासन की दृष्टि से यह पोस्ट जिलाधिकारी के समकक्ष मानी जाती है, हालाँकि जिले में अलग से एक जिलाधिकारी भी होता है।
अंग्रेजों के काल में सांगली एक संस्थानिक राज्य हुआ करता था। अर्थात् वहाँ एक राजा था और राजाओं के अपने शौक। अतः उन्होंने एक बड़ा सा चिड़ियाघर खोलकर उसमें कई पशु-पक्षी पाले थे। स्वतंत्रता के बाद राजपाट समाप्त हो गए और वह चिड़ियाघर भी सार्वजनिक हो गया। वहाँ सिंह और सिंहनियाँ भी थीं और जब उनके छोटे बच्चे पैदा होते, तो उन्हें सरकस के मालिकों के हाथ बेच दिया जाता था। इससे चिड़ियाघर को कुछ कमाई भी हो जाती थी।
क्या तुम जानते हो कि चिड़ियाघर का खर्च कैसे चलता है? शहर की नगरपालिका यह खर्चा चलाती है। प्रायः उनके पास पैसे कम होते हैं और चिड़ियाघरों की देखभाल ठीक से नहीं हो पाती। उधर सरकस के मालिक भी जानवर बच्चों को खरीदकर उन्हें तरह-तरह की कलाबाजियाँ सिखाने के लिए कई बार उनके साथ क्रूरता से पेश आते हैं। इसलिए सरकार बीच-बीच में नियम बनाती है कि छोटे जानवर बच्चे नहीं बेचे जाएँगे। कुछ समय बाद ये नियम फिर ढीले पड़ जाते हैं।
उन दिनों भी सरकार ने रोक लगाई थी कि सिंह, बाघ इत्यादि के छोटे बच्चे सरकस में नहीं बेचे जाएँगे। इधर सांगली नगरपालिका के पास पैसे नहीं थे कि जानवरों की ठीक से देखभाल हो। उसी समय चिड़ियाघर की एक सिंहनी ने तीन बच्चों का जन्म दिया। चिड़ियाघर के कर्मचारी खुश थे, लेकिन अधिकारी गण दुःखी हो गए। उन्हीं दिनों महाराष्ट्र के गवर्नर श्री लतीफ सांगली जिले के दौरे पर आए। शाम को उन्होंने सिंहनी के नए बच्चे देखने चाहे। बच्चों को टोकरियों में भरकर लागया गया। मैं और जिलाधिकारी गवर्नर का सारा इंतजाम देख रहे थे और अंदर उनसे बातें कर रहे थे। पर बाहर कुछ खुसर-पुसर हो रही थी। मै बाहर आयी। पूछा, तो नगरपालिका के कर्मचारी चिंता जता रहे थे कि आगे इन बच्चों के खर्चे की व्यवस्था कैसे होगी। झट मेरे दिमाग में कुछ बातें कौंध गयीं।
कुछ वर्ष पहले हम लोगों ने किस्से पढ़े थे कि धुले शहर के एक डॉक्टर पूर्णपात्रे अपने घर में सिंह और बाघ को पाला करते थे। उनकी एक सिंहनी सोनाली बड़ी मशहूर थी, जिसे बाद में उन्होंने पुणे के चिड़ियाघर में रखवा दिया था। मैं अपने परिवार के साथ, खासकर बच्चों के साथ उसे देखने कई बार जाया करती थी। जब डॉ. पूर्णपत्रे पुणे आते थे और सोनाली के
पिंजरे में जाकर उससे मिलते थे तो सोनाली भी उनके गले से लिपट कर तरह-तरह की आवाजें निकालती थीं। मानो उनसे हजार बातें कर रही हो। वह दृश्य देखनेवालों के दिल भर आते थे। हम लोगों ने भी यह दृश्य देखा था।
नगरपालिका की चिंता सुनकर मैंने सोचा, क्यों न मैं भी इन सिंह बच्चों को पाल लूँ ! नगरपालिका के खर्चे का बोझ कुछ कम हो जाएगा। किसी खास जानकारी की आवश्यकता हुई तो डॉ पूर्णपात्रे को चिट्ठी लिख दूँगी। नगरपालिका वालों ने 'हां' कर दी तो मैंने वन विभाग से अनुमति ली। फिर घर के लंबे-चौड़े बगीचे में एक बहुत बड़ा पिंजरा बनवाया। पिंजरे में सौ-सौ वर्ग फुट के दो खाने थे। बीच में इधर-से-उधर आने जाले के लिए दरवाजा था। दोनों पिंजरों से बाहर आने के लिए भी दरवाजे थे। ऊँचाई भी करीब १५ फट थी। वन विभाग की अनुमति और पिंजरे बनवाने में दो महीने बीत गए। फिर वह छोटी सिंहनी हमारे घर आयी, जिसे मैंने चुना था। हमने उसका नाम रखा 'रानी'। लेकिन अब रानी बड़ी होकर तीन माह की हो गई थी। उतनी अबोध नहीं थी, जितनी मैंने पहली बार देखी थी। मेरी अनुपस्थिति में उसे पिंजरे से बाहर नहीं रखा जा सकता था। पहले मैंने सोचा कि जब इसे पिंजरे में ही रखना पड़े तो फिर क्या चिड़ियाघर और क्या मेरा घर ! लेकिन चिड़ियाघर का उसका कमरा अँधेरा, सीलन-भरा और छोटा-सा था। हमने यही सोचकर उसे रख लिया कि यहाँ पिंजरा तो बड़ा है और खुला-खुला है।
पहले दिन उसने खूब ऊधम मचाया। वह पिंजरे की छड़ें पकड़ कर बंदर की तरह ऊपर तक चढ़ जाती और देखती कि वहाँ से कोई बाहर निकलने का रास्ता है या नहीं। फिर उसे खींचकर नीचे उतारना पड़ता था। इस बीच मैंने कई बार चिड़ियाघर जाकर उससे थोड़ी सी दोस्ती बनाई थी। वह थी बिल्ली के बच्चे की ही तरह, लेकिन वजन में बहुत भारी थी। धीरे-धीरे मेरी उसकी दोस्ती बढ़ने लगी। मैं सुबह-सुबह उसके पिंजरे के अंदर चली जाती। सफाई के लिए उसे दूसरे पिंजरे में भेज देती। उसे दूध देना, पानी देना और उससे बातें करना। यह हर सुबह का काम होता था। सप्ताह में दो बार उसे कच्चा मांस खिलाती थी। वह भी अपने हाथ में टुकड़े रखकर। वैसे मैं तो पूरी तरह शाकाहारी हूँ लेकिन रानी का खाना तो उसे मिलना ही चाहिए। शायद इसीलिए उसने मेरी दोस्ती स्वीकार की थी। जब में ऑफिस जाती तो उसे कहती- 'रानी, मैं ऑफिस जा रही हूँ'। फिर वह देर तक पिंजरे की उस दिशा में खड़ी रहती, जिधर से मेरी कार जाती थी। वापस आने पर मैं उसे
बताती- 'रानी, मैं वापस आ गई हूँ।' वह तुरन्त पिंजरे के पास आती और सिर सहलाने को कहती।
मेरे बच्चे और पड़ोस के कई बच्चे बाहर से ही उससे बातें करते। कभी मुझे दूरदराज के गाँवों में भी जाना पड़ता था। उन दो तीन दिनों के लिए रानी अकेली पड़ जाती थी। मैरे लौटने पर वह खूब उछल-कूद मचाती थी। एक बार मैं टूर से लौटी तो देखा, रानी के पैर की हड्डी टूट गई है। पता चला कि चिड़ियाघर का उसका जानने वाला कर्मचारी शिकलगार घर में आया था। उसने रानी को बाहर निकाला। कुछ उसके साथ खेला-कूदा भी। फिर क्या हुआ यह मैं ठीक से नहीं जान सकी, लेकिन वह कहीं से गिरी और हड्डी तोड़ बैठी। शहर के प्रख्यात अस्थि विशेषज्ञ डॉ. कुलकर्णी ने उसके पैर पर प्लास्टर लगाया। कुछ एक्स-रे भी किए, जो आज भी उनके संग्रह में यादगार बने हुए हैं। दस-बारह दिनों में रानी ठीक भी हो गयी।
यों तीन माह बीते। जो रानी पहले एक फुट लंबी थी, अब साढ़े चार फुट लंबी हो गयी थी। वजन में भी भारी। अब मैं उसे गोद में नही उठा सकती थी। फिर एक बार मुझे पंद्रह दिनों के लिए बाहर जाने की नौबत आयी। बच्चों के साथ रहने के लिए गाँव से मेरी माँ आ गई। घर में पैर रखने से पहले ही बोल पड़ी 'यह रानी यहाँ क्यों है?' मैंने तुम्हें कई चिट्ठियाँ लिखी थीं कि इसे वापस भेज देना। अब तो तुम्हें चुनना पड़ेगा, या तो मैं यहाँ रहूँगी या यह रानी ! मै बच्चों की देखभाल कर सकती हूँ, पर सिंह की नहीं।' इस प्रकार रानी फिर विदा हुई सांगली नगरपालिका के उसी छोटे-से कमरे में जहाँ से उसे निकालने के लिए मैं ले आई थी।
अगले एक वर्ष तक मैं सांगली में रही। तब मैं बीच-बीच में चिड़ियाघर जाकर उससे मिलती और बाहर से ही उससे बातें करती। चिड़ियाघर वाले मुझे अंदर जाने की अनुमति देकर रिस्क नहीं उठाना चाहते थे। फिर मेरा सांगली से तबादला हो गया। तब भी करीब एक वर्ष तक यदाकदा मैं सांगली गई तो देखा कि उसे मेरी याद थी और रानी पुकारने पर वह पास आ जाती थी। धीरे-धीरे वह भूल गई और मेरा वहाँ जाना भी समाप्त हो गया।
जीवन चलता रहता है। चिड़ियाघर में रानी दूसरी सिंह- सिंहनियों के बीच रही। पहली बार उसने तीन बच्चे जने ! बाद में और समय बीतता गया। शिकलगार अब बूढ़ा होकर रिटायर हो गया है। रानी के बच्चों के बच्चे भी आ गए हैं। एक दिन रानी मर गई तो सांगली चिड़ियाघर के अधिकारी ने खास तौर पर मुझे फोन करके यह दुःखद समाचार सुनाया। चिड़ियाघर के पुराने कर्मचारी पूछते हैं- 'आप कोई नया बच्चा रखेंगी? लेकिन कई अच्छे काम जीवन में एक बार ही हो पाते हैं,
बार-बार नहीं होते !
यह घटना है सन् १९८३ की। तब मेरी पोस्टिंग महाराष्ट्र के सांगली जिले में जिला परिषद् की प्रमुख कार्यकारी अधिकारी के पद पर हुई थी। महाराष्ट्र प्रशासन की दृष्टि से यह पोस्ट जिलाधिकारी के समकक्ष मानी जाती है, हालाँकि जिले में अलग से एक जिलाधिकारी भी होता है।
अंग्रेजों के काल में सांगली एक संस्थानिक राज्य हुआ करता था। अर्थात् वहाँ एक राजा था और राजाओं के अपने शौक। अतः उन्होंने एक बड़ा सा चिड़ियाघर खोलकर उसमें कई पशु-पक्षी पाले थे। स्वतंत्रता के बाद राजपाट समाप्त हो गए और वह चिड़ियाघर भी सार्वजनिक हो गया। वहाँ सिंह और सिंहनियाँ भी थीं और जब उनके छोटे बच्चे पैदा होते, तो उन्हें सरकस के मालिकों के हाथ बेच दिया जाता था। इससे चिड़ियाघर को कुछ कमाई भी हो जाती थी।
क्या तुम जानते हो कि चिड़ियाघर का खर्च कैसे चलता है? शहर की नगरपालिका यह खर्चा चलाती है। प्रायः उनके पास पैसे कम होते हैं और चिड़ियाघरों की देखभाल ठीक से नहीं हो पाती। उधर सरकस के मालिक भी जानवर बच्चों को खरीदकर उन्हें तरह-तरह की कलाबाजियाँ सिखाने के लिए कई बार उनके साथ क्रूरता से पेश आते हैं। इसलिए सरकार बीच-बीच में नियम बनाती है कि छोटे जानवर बच्चे नहीं बेचे जाएँगे। कुछ समय बाद ये नियम फिर ढीले पड़ जाते हैं।
उन दिनों भी सरकार ने रोक लगाई थी कि सिंह, बाघ इत्यादि के छोटे बच्चे सरकस में नहीं बेचे जाएँगे। इधर सांगली नगरपालिका के पास पैसे नहीं थे कि जानवरों की ठीक से देखभाल हो। उसी समय चिड़ियाघर की एक सिंहनी ने तीन बच्चों का जन्म दिया। चिड़ियाघर के कर्मचारी खुश थे, लेकिन अधिकारी गण दुःखी हो गए। उन्हीं दिनों महाराष्ट्र के गवर्नर श्री लतीफ सांगली जिले के दौरे पर आए। शाम को उन्होंने सिंहनी के नए बच्चे देखने चाहे। बच्चों को टोकरियों में भरकर लागया गया। मैं और जिलाधिकारी गवर्नर का सारा इंतजाम देख रहे थे और अंदर उनसे बातें कर रहे थे। पर बाहर कुछ खुसर-पुसर हो रही थी। मै बाहर आयी। पूछा, तो नगरपालिका के कर्मचारी चिंता जता रहे थे कि आगे इन बच्चों के खर्चे की व्यवस्था कैसे होगी। झट मेरे दिमाग में कुछ बातें कौंध गयीं।
कुछ वर्ष पहले हम लोगों ने किस्से पढ़े थे कि धुले शहर के एक डॉक्टर पूर्णपात्रे अपने घर में सिंह और बाघ को पाला करते थे। उनकी एक सिंहनी सोनाली बड़ी मशहूर थी, जिसे बाद में उन्होंने पुणे के चिड़ियाघर में रखवा दिया था। मैं अपने परिवार के साथ, खासकर बच्चों के साथ उसे देखने कई बार जाया करती थी। जब डॉ. पूर्णपत्रे पुणे आते थे और सोनाली के
पिंजरे में जाकर उससे मिलते थे तो सोनाली भी उनके गले से लिपट कर तरह-तरह की आवाजें निकालती थीं। मानो उनसे हजार बातें कर रही हो। वह दृश्य देखनेवालों के दिल भर आते थे। हम लोगों ने भी यह दृश्य देखा था।
नगरपालिका की चिंता सुनकर मैंने सोचा, क्यों न मैं भी इन सिंह बच्चों को पाल लूँ ! नगरपालिका के खर्चे का बोझ कुछ कम हो जाएगा। किसी खास जानकारी की आवश्यकता हुई तो डॉ पूर्णपात्रे को चिट्ठी लिख दूँगी। नगरपालिका वालों ने 'हां' कर दी तो मैंने वन विभाग से अनुमति ली। फिर घर के लंबे-चौड़े बगीचे में एक बहुत बड़ा पिंजरा बनवाया। पिंजरे में सौ-सौ वर्ग फुट के दो खाने थे। बीच में इधर-से-उधर आने जाले के लिए दरवाजा था। दोनों पिंजरों से बाहर आने के लिए भी दरवाजे थे। ऊँचाई भी करीब १५ फट थी। वन विभाग की अनुमति और पिंजरे बनवाने में दो महीने बीत गए। फिर वह छोटी सिंहनी हमारे घर आयी, जिसे मैंने चुना था। हमने उसका नाम रखा 'रानी'। लेकिन अब रानी बड़ी होकर तीन माह की हो गई थी। उतनी अबोध नहीं थी, जितनी मैंने पहली बार देखी थी। मेरी अनुपस्थिति में उसे पिंजरे से बाहर नहीं रखा जा सकता था। पहले मैंने सोचा कि जब इसे पिंजरे में ही रखना पड़े तो फिर क्या चिड़ियाघर और क्या मेरा घर ! लेकिन चिड़ियाघर का उसका कमरा अँधेरा, सीलन-भरा और छोटा-सा था। हमने यही सोचकर उसे रख लिया कि यहाँ पिंजरा तो बड़ा है और खुला-खुला है।
पहले दिन उसने खूब ऊधम मचाया। वह पिंजरे की छड़ें पकड़ कर बंदर की तरह ऊपर तक चढ़ जाती और देखती कि वहाँ से कोई बाहर निकलने का रास्ता है या नहीं। फिर उसे खींचकर नीचे उतारना पड़ता था। इस बीच मैंने कई बार चिड़ियाघर जाकर उससे थोड़ी सी दोस्ती बनाई थी। वह थी बिल्ली के बच्चे की ही तरह, लेकिन वजन में बहुत भारी थी। धीरे-धीरे मेरी उसकी दोस्ती बढ़ने लगी। मैं सुबह-सुबह उसके पिंजरे के अंदर चली जाती। सफाई के लिए उसे दूसरे पिंजरे में भेज देती। उसे दूध देना, पानी देना और उससे बातें करना। यह हर सुबह का काम होता था। सप्ताह में दो बार उसे कच्चा मांस खिलाती थी। वह भी अपने हाथ में टुकड़े रखकर। वैसे मैं तो पूरी तरह शाकाहारी हूँ लेकिन रानी का खाना तो उसे मिलना ही चाहिए। शायद इसीलिए उसने मेरी दोस्ती स्वीकार की थी। जब में ऑफिस जाती तो उसे कहती- 'रानी, मैं ऑफिस जा रही हूँ'। फिर वह देर तक पिंजरे की उस दिशा में खड़ी रहती, जिधर से मेरी कार जाती थी। वापस आने पर मैं उसे
बताती- 'रानी, मैं वापस आ गई हूँ।' वह तुरन्त पिंजरे के पास आती और सिर सहलाने को कहती।
मेरे बच्चे और पड़ोस के कई बच्चे बाहर से ही उससे बातें करते। कभी मुझे दूरदराज के गाँवों में भी जाना पड़ता था। उन दो तीन दिनों के लिए रानी अकेली पड़ जाती थी। मैरे लौटने पर वह खूब उछल-कूद मचाती थी। एक बार मैं टूर से लौटी तो देखा, रानी के पैर की हड्डी टूट गई है। पता चला कि चिड़ियाघर का उसका जानने वाला कर्मचारी शिकलगार घर में आया था। उसने रानी को बाहर निकाला। कुछ उसके साथ खेला-कूदा भी। फिर क्या हुआ यह मैं ठीक से नहीं जान सकी, लेकिन वह कहीं से गिरी और हड्डी तोड़ बैठी। शहर के प्रख्यात अस्थि विशेषज्ञ डॉ. कुलकर्णी ने उसके पैर पर प्लास्टर लगाया। कुछ एक्स-रे भी किए, जो आज भी उनके संग्रह में यादगार बने हुए हैं। दस-बारह दिनों में रानी ठीक भी हो गयी।
यों तीन माह बीते। जो रानी पहले एक फुट लंबी थी, अब साढ़े चार फुट लंबी हो गयी थी। वजन में भी भारी। अब मैं उसे गोद में नही उठा सकती थी। फिर एक बार मुझे पंद्रह दिनों के लिए बाहर जाने की नौबत आयी। बच्चों के साथ रहने के लिए गाँव से मेरी माँ आ गई। घर में पैर रखने से पहले ही बोल पड़ी 'यह रानी यहाँ क्यों है?' मैंने तुम्हें कई चिट्ठियाँ लिखी थीं कि इसे वापस भेज देना। अब तो तुम्हें चुनना पड़ेगा, या तो मैं यहाँ रहूँगी या यह रानी ! मै बच्चों की देखभाल कर सकती हूँ, पर सिंह की नहीं।' इस प्रकार रानी फिर विदा हुई सांगली नगरपालिका के उसी छोटे-से कमरे में जहाँ से उसे निकालने के लिए मैं ले आई थी।
अगले एक वर्ष तक मैं सांगली में रही। तब मैं बीच-बीच में चिड़ियाघर जाकर उससे मिलती और बाहर से ही उससे बातें करती। चिड़ियाघर वाले मुझे अंदर जाने की अनुमति देकर रिस्क नहीं उठाना चाहते थे। फिर मेरा सांगली से तबादला हो गया। तब भी करीब एक वर्ष तक यदाकदा मैं सांगली गई तो देखा कि उसे मेरी याद थी और रानी पुकारने पर वह पास आ जाती थी। धीरे-धीरे वह भूल गई और मेरा वहाँ जाना भी समाप्त हो गया।
जीवन चलता रहता है। चिड़ियाघर में रानी दूसरी सिंह- सिंहनियों के बीच रही। पहली बार उसने तीन बच्चे जने ! बाद में और समय बीतता गया। शिकलगार अब बूढ़ा होकर रिटायर हो गया है। रानी के बच्चों के बच्चे भी आ गए हैं। एक दिन रानी मर गई तो सांगली चिड़ियाघर के अधिकारी ने खास तौर पर मुझे फोन करके यह दुःखद समाचार सुनाया। चिड़ियाघर के पुराने कर्मचारी पूछते हैं- 'आप कोई नया बच्चा रखेंगी? लेकिन कई अच्छे काम जीवन में एक बार ही हो पाते हैं,
बार-बार नहीं होते !
०९--हमारा दोस्त टोटो --7--वह दुखभरा दिन
टोटो का हम पर पूरा भरोसा था। उसे रैबीज या अन्य इंजेक्शन लगाने के लिये अस्पताल में ले जाने पर उसे कभी सांकल या पट्टा नही लगाना पड़ता। एक बार उसे विटामिन बी काम्पलेक्स के इंजेक्शनों का बड़ा कोर्स करना पड़ा। इस इंजेक्शन की मात्रा अधिक होती है और लेते समय दुखता भी बहुत है। उसे मैं या प्रकाश यह इंजेक्शन लगाते थे। उसे लेटे लेटे बाँई ओर से दाँई ओर मुड़ने के लिये 'पलट' शब्द सिखाया हुआ था। उसे 'पलट' पोजिशन में लेटने के लिये कहकर हम इंजेक्शन तैयार करते। फिर उससे कहते, टोटो, यह इंजेक्शन दुखेगा, लेकिन हिलना मत! फिर इंजेक्शन पूरा हो जाने तक वह बिल्कुल नहीं हिलता था। हालाँकि दर्द से उसका शरीर कँपकँपाता था और मुँह से कूँ-कूँ भी निकलता, लेकिन वह जरा भी हिले बिना इंजेक्शन ले लेता।
फिर अचानक मेरा तबादला मुंबई हो गया। मैं, आदित्य और टोटो मुंबई में रहने लगे। टोटो के दुर्दिन तभी से शुरू हुए। मुझे हाजी अली एरिया में सरकारी घर मिला था, जहाँ से हम लोग अक्सर समुंदर के किनारे और जब कभी समुंदर पीछे हट गया हो तो उसके अंदर भी चले जाते। वहाँ समुंदर से आधा किलोमीटर अंदर जाने पर प्रसिद्ध हाजी अली की मस्जिद और दरगाह है, जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों जाते हैं। हमलोग टहलते हुए वहाँ तक चले जाते थे। लेकिन मुंबई की उमस भरी हवा टोटो को रास नहीं आई। उसके कानों में पीब होने लगा और ऑपरेशन के लिए उसे आठ दिन वरली के अस्पताल में रखना पड़ा। जब मैं उसे लेने गई तो मेरे गले लिपट कर ख़ूब रोया जैसे कह रहा हो, 'क्यों मुझे यहाँ क्यों छोड़ा था'।
तभी प्रकाश को ऑफ़िस के काम से तीन महीने हॉलेंड जाना पड़ा। मुंबई की नौकरी में भी मुझे टूरिंग के लिए तीन चार दिन बाहर जाना पड़ता था। आदित्य को तो मेरी सासू जी के पास रखा जा सकता था, लेकिन टोटो को नहीं। थोड़े बहुत उपाय कर चुकने के बाद उसे पुणे में ही एक परिचित मित्रके फ़ार्म-हाउस में रखवा दिया। वहाँ उसकी बड़ी दुर्गत बनी। शायद वे उसे खाना नहीं देते थे। बाद में मुझसे कहा कि आप लोगों के बग़ैर वह खाने से इन्कार कर देता था। लेकिन मुझे कभी भी मुंबई में फ़ोन या पत्र लिखकर नहीं बताया। प्रकाश वापस आने पर सबसे पहले फ़ार्म हाउस जाकर उससे मिल आया। तब भी टोटो प्रकाश से लिपट कर बहुत रोया। लेकिन तब तक पुणे का मेरा सरकारी घर हम ख़ाली कर चुके थे और प्रकाश को सबसे पहले किराए का घर ढूँढ़ना था। प्रकाश को लगा कि घर आ जाने पर टोटो ठीक हो जाएगा। तभी मेरा तबादला भी फिर से पुणे में हो गया। हम लोगों ने मित्र को बताया कि आठ-दस दिनों में ही टोटो को घर ले जाएँगे।
लेकिन आठवें ही दिन जब उसे लाने पहुँचे तो वहाँ के नौकरों ने बड़ी बेदर्दी से बताया कि उसकी तबीयत बहुत खऱाब थी, इसलिए कल ही उसे जहर का इंजेक्शन देकर मार दिया है - वह देखिए, उधर उस गड्ढे में उसे गाड़ दिया है।
वह दुखभरा दिन और मित्र कहलाने वाले उस परिचित का यह दुर्व्यवहार हम कभी नहीं भूल सकते। बाद में भी हमारे घर में कई कुत्ते आए, लेकिन जो टोटो था वैसा और कोई नहीं था।
फिर अचानक मेरा तबादला मुंबई हो गया। मैं, आदित्य और टोटो मुंबई में रहने लगे। टोटो के दुर्दिन तभी से शुरू हुए। मुझे हाजी अली एरिया में सरकारी घर मिला था, जहाँ से हम लोग अक्सर समुंदर के किनारे और जब कभी समुंदर पीछे हट गया हो तो उसके अंदर भी चले जाते। वहाँ समुंदर से आधा किलोमीटर अंदर जाने पर प्रसिद्ध हाजी अली की मस्जिद और दरगाह है, जहाँ हिंदू और मुसलमान दोनों जाते हैं। हमलोग टहलते हुए वहाँ तक चले जाते थे। लेकिन मुंबई की उमस भरी हवा टोटो को रास नहीं आई। उसके कानों में पीब होने लगा और ऑपरेशन के लिए उसे आठ दिन वरली के अस्पताल में रखना पड़ा। जब मैं उसे लेने गई तो मेरे गले लिपट कर ख़ूब रोया जैसे कह रहा हो, 'क्यों मुझे यहाँ क्यों छोड़ा था'।
तभी प्रकाश को ऑफ़िस के काम से तीन महीने हॉलेंड जाना पड़ा। मुंबई की नौकरी में भी मुझे टूरिंग के लिए तीन चार दिन बाहर जाना पड़ता था। आदित्य को तो मेरी सासू जी के पास रखा जा सकता था, लेकिन टोटो को नहीं। थोड़े बहुत उपाय कर चुकने के बाद उसे पुणे में ही एक परिचित मित्रके फ़ार्म-हाउस में रखवा दिया। वहाँ उसकी बड़ी दुर्गत बनी। शायद वे उसे खाना नहीं देते थे। बाद में मुझसे कहा कि आप लोगों के बग़ैर वह खाने से इन्कार कर देता था। लेकिन मुझे कभी भी मुंबई में फ़ोन या पत्र लिखकर नहीं बताया। प्रकाश वापस आने पर सबसे पहले फ़ार्म हाउस जाकर उससे मिल आया। तब भी टोटो प्रकाश से लिपट कर बहुत रोया। लेकिन तब तक पुणे का मेरा सरकारी घर हम ख़ाली कर चुके थे और प्रकाश को सबसे पहले किराए का घर ढूँढ़ना था। प्रकाश को लगा कि घर आ जाने पर टोटो ठीक हो जाएगा। तभी मेरा तबादला भी फिर से पुणे में हो गया। हम लोगों ने मित्र को बताया कि आठ-दस दिनों में ही टोटो को घर ले जाएँगे।
लेकिन आठवें ही दिन जब उसे लाने पहुँचे तो वहाँ के नौकरों ने बड़ी बेदर्दी से बताया कि उसकी तबीयत बहुत खऱाब थी, इसलिए कल ही उसे जहर का इंजेक्शन देकर मार दिया है - वह देखिए, उधर उस गड्ढे में उसे गाड़ दिया है।
वह दुखभरा दिन और मित्र कहलाने वाले उस परिचित का यह दुर्व्यवहार हम कभी नहीं भूल सकते। बाद में भी हमारे घर में कई कुत्ते आए, लेकिन जो टोटो था वैसा और कोई नहीं था।
०९--हमारा दोस्त टोटो --6--घर का जिम्मेदार व्यक्ति
टोटो का, और सच पूछो तो सभी कुत्तों का एक बाल- हठ होता है कि उसे घर का जिम्मेदार व्यक्ति माना जाय, वही सम्मान दिया जाय। जब मेहमान घर में आएँ तो उनका परिचय करवाया जाय, उन्हें मेहमानों से भेंट करने (या चाटने !) दिया जाय। और जहाँ आप सब बैठकर बातें करेंगे वहाँ उन्हें भी बैठने दिया जाय।
लेकिन जरूरी नहीं कि हर मेहमान को कुत्ते पसंद हों। इसलिए हमने पहले प्लान बनाया कि मेहमान आयेंगे तो टोटो को बालकनी में भेजा जाएगा। फिर भी उसे न लगे कि उसे अकेले बाहर बंद कर दिया है इसलिए हमने दरवा.जे के साथ-साथ डेढ गज ऊँचा जाली का एक और दरवा.जा बनवाया ताकि टोटो का सिर दरवा.जे से ऊपर रहे और वह हमें देख सके। फिर भी जब मेहमानों के कारण उसे बालकनी में भेज कर हम छोटे दरवाजे की कुंडी लगा देते तो वह पहले कूं-कूं कर रोने लगता। फिर जैसे छोटे बच्चे धीरे-धीरे अपना रोने का सुर ऊँचा करते हैं, वैसे ही वह भी करता था। फिर यदि हमने मेहमानों को समझा बुझा कर उसे अंदर ले लिया तो प्रकाश के पैरों के पास बैठकर गंभीरता से हमारी बातें सुनता था। जब उन्हें रिक्शा तक छोड़ने के लिए हम जाते तो वह भी साथ जाता। ख़ास कर उनमें से जो बच्चे या औरतें हों तो उनके साथ रहता मानो वह समझ रहा हो कि किसका ज़्यादा ख़्याल रखना है।
आदित्य केवल तीन चार महीने का रहा होगा तब कि बात है। मैं उसे लेकर आठ-दस दिन के लिए दूसरे गाँव गई थी। लौटने पर पहले घर में मैं अकेली ही घुसी। टोटो ने पहले मेरे साथ काफ़ी उछल कूद कर ली। फिर हम पड़ोसी के घर में रखे आदित्य को उठा लाए। टोटो उसके साथ भी खेलने और उसे चाटने के लिए उतावला हो रहा था। प्रकाश ने कहा - देखो टोटो, मैं तुम्हें आदित्य के पास आने दूँगा लेकिन सँभल कर आना, वह छोटा बच्चा है और सो रहा है। प्रकाश ने आदित्य को अपनी बाँहों में उठा रखा था। टोटो हवा में थोड़ा सा लपका और बड़ी ही कोमलता से उसने आदित्य के मुँह को चूम लिया। वह दृश्य अब भी मेरी आँखों के सामने है।
जब आदित्य छह सात महीने का होकर घुटनों पर चलने लगा तब की बात है। दोपहर का समय था। मैंने टोटो के लिए ज्वार की रोटी का चूरा और दूध सान कर उसकी थाली बालकनी में रखी और उसे खाने के लिए कह कर अपने काम में लग गई। जरा सी देर में लगा कि टोटो के खाने की आवा.ज क्यों नहीं आ रही ! और आदित्य कहाँ है ! बालकनी में जाकर देखा तो आदित्य वहाँ पहुँच कर टोटो की थाली से रोटी के टुकड़े निकाल कर अपने मुँह में डाल रहा था और टोटो थाली छोड़कर दूर एक कोने में चुपचाप बेचारगी की मूर्ति बना खड़ा था, मानों कह रहा हो - देखो, मेरी कोई गलती नहीं है।
आदित्य जब तक खड़ा होकर चलने लगा, तब तक टोटो शानदार भरा - पूरा कुत्ता बन चुका था, आदित्य से कुछ ऊँचा ही था। फिर भी आदित्य उसे यों बरतता जैसे - वह कोई खिलौना हो। अदित्य ने उसका नाम भी बदल कर -भप्पी कर डाला। भप्पी स्पीक, भप्पी दौड़ जा, भप्पी पत्थर ढूँढ़ ला - - यहाँ तक ठीक था। लेकिन जब आदित्य कहता भप्पी हील, और टोटो उसकी बाँई ओर अटेंशन की मुद्रा में खड़ा हो जाता तो सबको हँसी आ जाती। लोगों ने इस जोडी का नाम रखा 'लिटिल मास्टर विथ बिग फ्रेंड'।
हमारे ही इलाके सदर्न कमांड का मुख्यालय था और उन दिनों आज की तरह उस रास्ते पर आने जाने के लिए कोई पाबंदियाँ नहीं थीं। भारत पाक युद्ध के दौरान कब्.जा किया गया एक पैटन टैंक मुख्यालय के सामने रखा हुआ था (उसे अब हटाकर संभाजी पार्क में रखा गया है।) रोज शाम प्रकाश, आदित्य और टोटो उधर घूमने जाते तो आदित्य और टोटो उस टैंक पर जा बैठते थे। फिर उस पर से नीचे कूदने का और दुबारा जम्प लगाकर ऊपर चढ़ने का सिलसिला शुरु हो जाता। इसमें आदित्य के जम्पस् केवल छुन्नू-मुन्नू होते थे और प्रकाश ने उसे कंधे से पकड़ा होता था। लेंकिन टोटो पूरी सक्रियता से जम्प लगाता।
यहीं से कुछ आगे जाने पर सदर्न कमांड के अन्य अफसरों के घर थे, जिनमें पांच-छह फुट ऊंची कम्पाउंड वॉल्स लगी हैं। वहाँ भी टोटो छलांग लगाकर चढ़ जाता। हर दिन उसके नियमित व्यायाम के लिए ऐसी पांच-छह छलांग उससे लगवाते थे। टहलने के लिये निकले बाकी लोगों के लिए यह एक कौतुक का विषय था।
कई बार कम्पाउंड वॉल्स उतनी चौड़ी नही होती कि छलांग लगाकर उस पर बैठा जा सके। इसके लिये टोटो को दो शब्द सिखाये थे। 'अप' या जम्प का अर्थ था कि उपर चौड़ी जगह है, चढ़ कर बैठ जाओ। लेकिंन 'उफ-फू' का अर्थ था कि ऊपर बैठने लायक जगह नहीं है, सो वहाँ जरा से पैर टिकाकर दूसरी तरफ जमीन पर कूद जाना है। इसमें भी टोटो प्रवीण हो गया था। लेकिंन यह सिखाने के लिये प्रकाश को खुद उसे एसी छलांग लगाकर दिखाना पड़ा था जिनकी कम्पाउंड वॉल ऐसे ट्रेनिंग के लिये काम आई, उन अफसरों के साथ प्रकाश की दोस्ती हो गई।
लेकिन जरूरी नहीं कि हर मेहमान को कुत्ते पसंद हों। इसलिए हमने पहले प्लान बनाया कि मेहमान आयेंगे तो टोटो को बालकनी में भेजा जाएगा। फिर भी उसे न लगे कि उसे अकेले बाहर बंद कर दिया है इसलिए हमने दरवा.जे के साथ-साथ डेढ गज ऊँचा जाली का एक और दरवा.जा बनवाया ताकि टोटो का सिर दरवा.जे से ऊपर रहे और वह हमें देख सके। फिर भी जब मेहमानों के कारण उसे बालकनी में भेज कर हम छोटे दरवाजे की कुंडी लगा देते तो वह पहले कूं-कूं कर रोने लगता। फिर जैसे छोटे बच्चे धीरे-धीरे अपना रोने का सुर ऊँचा करते हैं, वैसे ही वह भी करता था। फिर यदि हमने मेहमानों को समझा बुझा कर उसे अंदर ले लिया तो प्रकाश के पैरों के पास बैठकर गंभीरता से हमारी बातें सुनता था। जब उन्हें रिक्शा तक छोड़ने के लिए हम जाते तो वह भी साथ जाता। ख़ास कर उनमें से जो बच्चे या औरतें हों तो उनके साथ रहता मानो वह समझ रहा हो कि किसका ज़्यादा ख़्याल रखना है।
आदित्य केवल तीन चार महीने का रहा होगा तब कि बात है। मैं उसे लेकर आठ-दस दिन के लिए दूसरे गाँव गई थी। लौटने पर पहले घर में मैं अकेली ही घुसी। टोटो ने पहले मेरे साथ काफ़ी उछल कूद कर ली। फिर हम पड़ोसी के घर में रखे आदित्य को उठा लाए। टोटो उसके साथ भी खेलने और उसे चाटने के लिए उतावला हो रहा था। प्रकाश ने कहा - देखो टोटो, मैं तुम्हें आदित्य के पास आने दूँगा लेकिन सँभल कर आना, वह छोटा बच्चा है और सो रहा है। प्रकाश ने आदित्य को अपनी बाँहों में उठा रखा था। टोटो हवा में थोड़ा सा लपका और बड़ी ही कोमलता से उसने आदित्य के मुँह को चूम लिया। वह दृश्य अब भी मेरी आँखों के सामने है।
जब आदित्य छह सात महीने का होकर घुटनों पर चलने लगा तब की बात है। दोपहर का समय था। मैंने टोटो के लिए ज्वार की रोटी का चूरा और दूध सान कर उसकी थाली बालकनी में रखी और उसे खाने के लिए कह कर अपने काम में लग गई। जरा सी देर में लगा कि टोटो के खाने की आवा.ज क्यों नहीं आ रही ! और आदित्य कहाँ है ! बालकनी में जाकर देखा तो आदित्य वहाँ पहुँच कर टोटो की थाली से रोटी के टुकड़े निकाल कर अपने मुँह में डाल रहा था और टोटो थाली छोड़कर दूर एक कोने में चुपचाप बेचारगी की मूर्ति बना खड़ा था, मानों कह रहा हो - देखो, मेरी कोई गलती नहीं है।
आदित्य जब तक खड़ा होकर चलने लगा, तब तक टोटो शानदार भरा - पूरा कुत्ता बन चुका था, आदित्य से कुछ ऊँचा ही था। फिर भी आदित्य उसे यों बरतता जैसे - वह कोई खिलौना हो। अदित्य ने उसका नाम भी बदल कर -भप्पी कर डाला। भप्पी स्पीक, भप्पी दौड़ जा, भप्पी पत्थर ढूँढ़ ला - - यहाँ तक ठीक था। लेकिन जब आदित्य कहता भप्पी हील, और टोटो उसकी बाँई ओर अटेंशन की मुद्रा में खड़ा हो जाता तो सबको हँसी आ जाती। लोगों ने इस जोडी का नाम रखा 'लिटिल मास्टर विथ बिग फ्रेंड'।
हमारे ही इलाके सदर्न कमांड का मुख्यालय था और उन दिनों आज की तरह उस रास्ते पर आने जाने के लिए कोई पाबंदियाँ नहीं थीं। भारत पाक युद्ध के दौरान कब्.जा किया गया एक पैटन टैंक मुख्यालय के सामने रखा हुआ था (उसे अब हटाकर संभाजी पार्क में रखा गया है।) रोज शाम प्रकाश, आदित्य और टोटो उधर घूमने जाते तो आदित्य और टोटो उस टैंक पर जा बैठते थे। फिर उस पर से नीचे कूदने का और दुबारा जम्प लगाकर ऊपर चढ़ने का सिलसिला शुरु हो जाता। इसमें आदित्य के जम्पस् केवल छुन्नू-मुन्नू होते थे और प्रकाश ने उसे कंधे से पकड़ा होता था। लेंकिन टोटो पूरी सक्रियता से जम्प लगाता।
यहीं से कुछ आगे जाने पर सदर्न कमांड के अन्य अफसरों के घर थे, जिनमें पांच-छह फुट ऊंची कम्पाउंड वॉल्स लगी हैं। वहाँ भी टोटो छलांग लगाकर चढ़ जाता। हर दिन उसके नियमित व्यायाम के लिए ऐसी पांच-छह छलांग उससे लगवाते थे। टहलने के लिये निकले बाकी लोगों के लिए यह एक कौतुक का विषय था।
कई बार कम्पाउंड वॉल्स उतनी चौड़ी नही होती कि छलांग लगाकर उस पर बैठा जा सके। इसके लिये टोटो को दो शब्द सिखाये थे। 'अप' या जम्प का अर्थ था कि उपर चौड़ी जगह है, चढ़ कर बैठ जाओ। लेकिंन 'उफ-फू' का अर्थ था कि ऊपर बैठने लायक जगह नहीं है, सो वहाँ जरा से पैर टिकाकर दूसरी तरफ जमीन पर कूद जाना है। इसमें भी टोटो प्रवीण हो गया था। लेकिंन यह सिखाने के लिये प्रकाश को खुद उसे एसी छलांग लगाकर दिखाना पड़ा था जिनकी कम्पाउंड वॉल ऐसे ट्रेनिंग के लिये काम आई, उन अफसरों के साथ प्रकाश की दोस्ती हो गई।
०९--हमारा दोस्त टोटो --5--तुझे मुंबई नहीं लें जा सकते
मेरी टूर में कभी कभी प्रकाश भी शामिल हो तो टोटों बड़ा ख़ुश होता। फिर वे दोनों पहाड़ों और कि़लों पर घूमने चले जाते। मेरी सब डिवी.जन में चारों तरफ़ शिवाजी-कालीन गढ़ और कि़ले थे जैसे सिंहगड़, राजगड़, लोहगड़ इत्यादि। टोटो इन सभी गड़ों पर चक्कर लगा चुका था।
नाइट हॉल्ट ना हो, तब मैं गाँवों के इंस्पेक्शन पूरे करके घर लौट आती। इसका कोई समय निर्धारित नहीं होता। कभी शाम के छ बजे तो कभी रात के दो-तीन बजे भी मैं घर आती। उन दिनों घर में संदेशा भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी कि मैं कितनी देर से लौटूँगी। लेकिन मेरे लौटने के क़रीब आधा घंटा पहले टोटो दरवा.जे के पास चला आता था और तब तक वहीं रुकता जब तक मैं न आ जाँऊ। वैसे कुत्तों के कान और सूँघने की क्षमता अद्भुत होती है, फिर भी इतनी दूर से मेरे आने का पता लगना केवल इन्हीं दो बातों से नहीं हो सकता।
इससे भी आश्चर्य की दो घटनाएँ हमें याद आती हैं। एक बार प्रकाश के छोटे भाई को इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखि़ला दिलवाने प्रकाश को सांगली जाना पड़ा, जो पुणे से क़रीब २०० किलोमीटर दूर है। इस काम में चार-पाँच दिन लगने थे। लेकिन दूसरी ही रात की बात है - टोटो मेरे पलंग के नीचे से उठकर दरवा.जे के पास जा बैठा। मैं भी बड़ी सावधानी से दरवा.जे तक गई। तो जनाब ख़ुश होकर पूँछ हिला रहे थे और हौले-हौले कूं-कूं भी कर रहे थे। मैं थोड़ी देर रुकी, फिर डाँटकर उसे सो जाने को कहा और वापस आ गई। लेकिन टोटो वहीं बैठा रहा। बीस-पचास मिनट बाद 'बेल' बजी और सामने प्रकाश हा.जिर। पता चला कि काम जल्दी हो गया था। स्टेशन से घर आने में क़रीब उतना ही समय लग जाता है।
इसी दौरान मुझे ट्रेनिंग के लिए मसूरी जाना पड़ा। आदित्य को मुंबई में दादी के पास रखकर मैं मसूरी चली गई। अब घर में प्रकाश और टोटो अकेले थे और प्रकाश के ऑफ़िस जाने पर टोटो निपट अकेला रह जाता। घर में अख़बार, कई तरह के बिल, चिट्ठियाँ आदि आते थे जिन्हें लोग दरवा.जे के अंदर से नीचे सरका देते थे। एक दिन ऑफ़िस से लौटकर प्रकाश ने देखा कि टोटो ने किसी काग़.ज को चबा चबाकर छोटा सा बॉल बना दिया था और उसी पर अपना मुँह रखकर बैठा था। बड़ी मुश्किल से प्रकाश ने उसे छीना, फिर बाल्टी भर पानी में उसे धोया तो काग़.ज की चिंदियाँ पानी पर तैरने लगीं। उन्हें सीधा किया, सुखाया और बड़ी कोशिश की समझने की कि ये कौन सा कागज हो सकता है? कुछेक ही अक्षर पढ़ने को मिले जिनसे पता चला कि वह मेरी चिट्ठी थी।
पंद्रह-बीस दिनों में मेरी दूसरी दो चिट्ठियों की यही गत बनी तो हारकर प्रकाश ने लैटर बॉक्स बनाया। अन्य किसी भी काग़.ज की ओर ध्यान न देने वाला टोटो केवल मेरी चिट्ठियों की महक से पहचान कर उन्हें चबाया करता था।
एक बार मेरी सासूजी पूना आईं - आठ दिन रहीं। टोटो एकदम उनका भक्त बन गया। जाने के दिन सुबह वे काफ़ी देर टोटो के पास बैठकर बातें करती रहीं कि अब मैं मुंबई वापस जाऊँगी। तुम ठीक से रहना। आदित्य का, घर का ख़्याल रखना इत्यादि। इस पर टोटो बेचारा क्या कहता, किस भाषा में कहता जो हम समझ पाते ! जाने से एक घंटा पहले उन्होंने अपना सामान पैक किया और बाहर के कमरे में लाकर रख दिया। टोटो उठा, उसे सोने के लिए जो टाट का बिस्तर बना हुआ था -अर्थात उसका सामान - वही घसीट कर ले आया और उनके सामान से भिड़ा कर रख दिया। उसे बहुत समझाना पड़ा कि बेटे, तुझे मुंबई नहीं लें जा सकते।
नाइट हॉल्ट ना हो, तब मैं गाँवों के इंस्पेक्शन पूरे करके घर लौट आती। इसका कोई समय निर्धारित नहीं होता। कभी शाम के छ बजे तो कभी रात के दो-तीन बजे भी मैं घर आती। उन दिनों घर में संदेशा भेजने की कोई व्यवस्था नहीं थी कि मैं कितनी देर से लौटूँगी। लेकिन मेरे लौटने के क़रीब आधा घंटा पहले टोटो दरवा.जे के पास चला आता था और तब तक वहीं रुकता जब तक मैं न आ जाँऊ। वैसे कुत्तों के कान और सूँघने की क्षमता अद्भुत होती है, फिर भी इतनी दूर से मेरे आने का पता लगना केवल इन्हीं दो बातों से नहीं हो सकता।
इससे भी आश्चर्य की दो घटनाएँ हमें याद आती हैं। एक बार प्रकाश के छोटे भाई को इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखि़ला दिलवाने प्रकाश को सांगली जाना पड़ा, जो पुणे से क़रीब २०० किलोमीटर दूर है। इस काम में चार-पाँच दिन लगने थे। लेकिन दूसरी ही रात की बात है - टोटो मेरे पलंग के नीचे से उठकर दरवा.जे के पास जा बैठा। मैं भी बड़ी सावधानी से दरवा.जे तक गई। तो जनाब ख़ुश होकर पूँछ हिला रहे थे और हौले-हौले कूं-कूं भी कर रहे थे। मैं थोड़ी देर रुकी, फिर डाँटकर उसे सो जाने को कहा और वापस आ गई। लेकिन टोटो वहीं बैठा रहा। बीस-पचास मिनट बाद 'बेल' बजी और सामने प्रकाश हा.जिर। पता चला कि काम जल्दी हो गया था। स्टेशन से घर आने में क़रीब उतना ही समय लग जाता है।
इसी दौरान मुझे ट्रेनिंग के लिए मसूरी जाना पड़ा। आदित्य को मुंबई में दादी के पास रखकर मैं मसूरी चली गई। अब घर में प्रकाश और टोटो अकेले थे और प्रकाश के ऑफ़िस जाने पर टोटो निपट अकेला रह जाता। घर में अख़बार, कई तरह के बिल, चिट्ठियाँ आदि आते थे जिन्हें लोग दरवा.जे के अंदर से नीचे सरका देते थे। एक दिन ऑफ़िस से लौटकर प्रकाश ने देखा कि टोटो ने किसी काग़.ज को चबा चबाकर छोटा सा बॉल बना दिया था और उसी पर अपना मुँह रखकर बैठा था। बड़ी मुश्किल से प्रकाश ने उसे छीना, फिर बाल्टी भर पानी में उसे धोया तो काग़.ज की चिंदियाँ पानी पर तैरने लगीं। उन्हें सीधा किया, सुखाया और बड़ी कोशिश की समझने की कि ये कौन सा कागज हो सकता है? कुछेक ही अक्षर पढ़ने को मिले जिनसे पता चला कि वह मेरी चिट्ठी थी।
पंद्रह-बीस दिनों में मेरी दूसरी दो चिट्ठियों की यही गत बनी तो हारकर प्रकाश ने लैटर बॉक्स बनाया। अन्य किसी भी काग़.ज की ओर ध्यान न देने वाला टोटो केवल मेरी चिट्ठियों की महक से पहचान कर उन्हें चबाया करता था।
एक बार मेरी सासूजी पूना आईं - आठ दिन रहीं। टोटो एकदम उनका भक्त बन गया। जाने के दिन सुबह वे काफ़ी देर टोटो के पास बैठकर बातें करती रहीं कि अब मैं मुंबई वापस जाऊँगी। तुम ठीक से रहना। आदित्य का, घर का ख़्याल रखना इत्यादि। इस पर टोटो बेचारा क्या कहता, किस भाषा में कहता जो हम समझ पाते ! जाने से एक घंटा पहले उन्होंने अपना सामान पैक किया और बाहर के कमरे में लाकर रख दिया। टोटो उठा, उसे सोने के लिए जो टाट का बिस्तर बना हुआ था -अर्थात उसका सामान - वही घसीट कर ले आया और उनके सामान से भिड़ा कर रख दिया। उसे बहुत समझाना पड़ा कि बेटे, तुझे मुंबई नहीं लें जा सकते।
०९--हमारा दोस्त टोटो --4--'नो' वाला हुक्म
'नो' वाला हुक्म
'किचन नो' का मतलब था कि टोटो, तुम्हें किचन में आना मना है। पूरे घर में मुक्त रूप से घूमने वाले टोटो के लिए यह आदेश बड़ा दुखदायी रहा होगा लेकिन उसने कभी उल्लंघन नहीं किया। पुणे के घर में किचन एक तरफ था लेकिन बाद में मुंबई के घर में किचन बीचोबीच था और किचन नो का मतलब था कि टोटो को दूर का चक्कर लगाकर
इधर से उधर जाना पड़ता। फिर भी उसने कभी किचन में प्रवेश नहीं किया। हफ़्ते में एक दिन उसके लिए मांस पकाया जाता। वैसे मैं पूरी तरह शाकाहारी हूँ और हमारे घर में आमलेट के सिवा अन्य मांसाहारी खाना नहीं के बराबर है। लेकिन टोटो के लिए मांस .जरूर पकाया जाता था। उसकी महक घर में फैलती तो टोटो का धीरज जवाब दे जाता। वह किचन के आसपास ही घूमता ओर कभी एकाघ पैर या गर्दन अंदर ले जाता। फिर हम लोग यों जताते मानों आपस में बात कर रहे हों - 'पता है एक आदमी रसोईघर में आने की कोशिश कर रहा है।' यह सुनकर बेचारा टोटो वहाँ से हटकर बालकनी में चला जाता।
उसे यह भी सिखाया था कि किसी दूसरे आदमी के हाथ से खाना तभी लेना है यदि प्रकाश या मैं या आदित्य इसकी इजा.जत दें। और 'खाना नो' कहा हो, तो सामने पड़ा खाना भी नहीं खाना है, भले ही वह मांस, मछली या चिकन ही क्यों न हो। कभी कभी दो-दो घंटे तक भी खाना न खाकर टोटो ने दिखा दिया था कि वह परीक्षा में अच्छी तरह पास था। लेकिन वह बुद्धिमान भी था - जल्दी ही जान गया था कि 'खाना नो' सुनने के बाद थाली के पास बैठे रहने की बजाय यदि वह हमारे आगे-पीछे घूमता रहे तो हम उसे बड़ी जल्दी खाने की इजा.जत दे देते हैं।
एक और 'नो' वाला हुक्म था जो उसे खलता था। मैं और प्रकाश दोनों नौकरी पर जाते। इसलिए हमारे आने पर उसकी इच्छा होती थी कि हमारे ऊपर उछल कूद करे, खेले, चाटे इत्यादि । हम उसे कहते - 'ऑफ़िस के कपड़े - नो'। फिर वह रुककर इंत.जार करता कि कब हम कपड़े बदलकर बाहर आएं और उसके साथ खेलें। कभी-कभी ऐसा भी होता कि ऑफ़िस से आओ, और ते.जी से कपड़े बदल कर किसी पार्टी के लिए तैयार हो जाओ। ऐसे समय दुबारा 'ऑफ़िस के कपड़े, नो' सुनकर वह बहुत मायूस हो जाता।
मेरी डयूटी काफ़ी टूरिंग वाली थी और अपने सब-डिवी.जन के गाँवों में 'नाईट हॉल्ट' करना आवश्यक होता था। टूरिंग के लिए एक जीप मिली हुई थी। आदित्य भी छोटा था। सो नाइट-हॉल्ट के लिए जाना हो तो जीप में मेरे साथ आदित्य, उसकी बुढ़िया आया, टोटो, टोटो के खाना खाने की थाली और सोने के लिए का टाट का बिछौना, ऑफ़िस का अर्दली इत्यादि पूरा दल-बल जाता था। टूर वाले गाँव में पहुँच कर मैं तो अपने काम में लग जाती पर टोटो इधर उधर घूम आता।
आज भी मेरे सब-डिवी.जन के रिटायर्ड पटवारी और रेस्ट हाउस के कर्मचारी आदित्य का हालचाल पूछते हैं और टोटो को याद कर लेते हैं।
'किचन नो' का मतलब था कि टोटो, तुम्हें किचन में आना मना है। पूरे घर में मुक्त रूप से घूमने वाले टोटो के लिए यह आदेश बड़ा दुखदायी रहा होगा लेकिन उसने कभी उल्लंघन नहीं किया। पुणे के घर में किचन एक तरफ था लेकिन बाद में मुंबई के घर में किचन बीचोबीच था और किचन नो का मतलब था कि टोटो को दूर का चक्कर लगाकर
इधर से उधर जाना पड़ता। फिर भी उसने कभी किचन में प्रवेश नहीं किया। हफ़्ते में एक दिन उसके लिए मांस पकाया जाता। वैसे मैं पूरी तरह शाकाहारी हूँ और हमारे घर में आमलेट के सिवा अन्य मांसाहारी खाना नहीं के बराबर है। लेकिन टोटो के लिए मांस .जरूर पकाया जाता था। उसकी महक घर में फैलती तो टोटो का धीरज जवाब दे जाता। वह किचन के आसपास ही घूमता ओर कभी एकाघ पैर या गर्दन अंदर ले जाता। फिर हम लोग यों जताते मानों आपस में बात कर रहे हों - 'पता है एक आदमी रसोईघर में आने की कोशिश कर रहा है।' यह सुनकर बेचारा टोटो वहाँ से हटकर बालकनी में चला जाता।
उसे यह भी सिखाया था कि किसी दूसरे आदमी के हाथ से खाना तभी लेना है यदि प्रकाश या मैं या आदित्य इसकी इजा.जत दें। और 'खाना नो' कहा हो, तो सामने पड़ा खाना भी नहीं खाना है, भले ही वह मांस, मछली या चिकन ही क्यों न हो। कभी कभी दो-दो घंटे तक भी खाना न खाकर टोटो ने दिखा दिया था कि वह परीक्षा में अच्छी तरह पास था। लेकिन वह बुद्धिमान भी था - जल्दी ही जान गया था कि 'खाना नो' सुनने के बाद थाली के पास बैठे रहने की बजाय यदि वह हमारे आगे-पीछे घूमता रहे तो हम उसे बड़ी जल्दी खाने की इजा.जत दे देते हैं।
एक और 'नो' वाला हुक्म था जो उसे खलता था। मैं और प्रकाश दोनों नौकरी पर जाते। इसलिए हमारे आने पर उसकी इच्छा होती थी कि हमारे ऊपर उछल कूद करे, खेले, चाटे इत्यादि । हम उसे कहते - 'ऑफ़िस के कपड़े - नो'। फिर वह रुककर इंत.जार करता कि कब हम कपड़े बदलकर बाहर आएं और उसके साथ खेलें। कभी-कभी ऐसा भी होता कि ऑफ़िस से आओ, और ते.जी से कपड़े बदल कर किसी पार्टी के लिए तैयार हो जाओ। ऐसे समय दुबारा 'ऑफ़िस के कपड़े, नो' सुनकर वह बहुत मायूस हो जाता।
मेरी डयूटी काफ़ी टूरिंग वाली थी और अपने सब-डिवी.जन के गाँवों में 'नाईट हॉल्ट' करना आवश्यक होता था। टूरिंग के लिए एक जीप मिली हुई थी। आदित्य भी छोटा था। सो नाइट-हॉल्ट के लिए जाना हो तो जीप में मेरे साथ आदित्य, उसकी बुढ़िया आया, टोटो, टोटो के खाना खाने की थाली और सोने के लिए का टाट का बिछौना, ऑफ़िस का अर्दली इत्यादि पूरा दल-बल जाता था। टूर वाले गाँव में पहुँच कर मैं तो अपने काम में लग जाती पर टोटो इधर उधर घूम आता।
आज भी मेरे सब-डिवी.जन के रिटायर्ड पटवारी और रेस्ट हाउस के कर्मचारी आदित्य का हालचाल पूछते हैं और टोटो को याद कर लेते हैं।
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