Wednesday, August 8, 2007

०३--चील की चाल

०३--चील की चाल

चील। चील का मुझे बचपन से आकर्षण रहा है। वह कितनी ताकतवर होती है, कैसे बिना थके घंटों तक आकाश में चक्कर लगाती है, कितनी उंची उडती है ! वैसे गरूड, बाज, चील, हंस- ये आकाश में बडी उंचाई पर उडते हैं। लेकिन चील ही है जो हमारी बस्तियों के आसपास रहती है। खूब उंचाई से वह अपने घोंसले और बच्चों का ध्यान रखती है। अतः बचपन में दो बातें दिमाग में थी- एक कि चील कभी घोंसले में नही रहती है; दूसरा कि उसके पास ताकत का अपार सोता होगा, तभी तो घंटो उडते हुए वह नही थकती।
लेकिन धीरे-धीरे ज्ञान बढा कि चील कैसे उडती है। चील के पंख बहुत फैले हुए और खास ग्लाइडिंग के लिए बने होते हैं। सूरज की गर्मी से जब हवा तपती है तो जमीन से अलग अलग ऊँचाइयों पर हवा कम अधिक तपती है। उसकी अलग अलग परतों के तापक्रम में अंतर आ जाता है तो ठण्डी परत से हवा चलकर गरम परत की ओर जाती है। इससे हवा की छोटी छोटी धाराएँ बहने लगती हैं। इन्हें 'थर्मल' कहते हैं। चील इन्हीं थर्मल के अंदर घुस जाती है। फिर थर्मल ही उसे ले जाते हैं। इसी से तुमने देखा होगा कि चील बडी देर तक बिना पंख हिलाए उड सकती है। सही कहा जाए तो चील उडती नही, बल्कि हवा में तैरती है। जब थर्मल से बाहर कहीं जाना हो, या एक थर्मल से दूसरे में जाना हो, तभी वह पंख फडफडाकर उडती है।
अब रही बात उसके घोंसले में न रहने की। एक बार मैं कोल्हापूर के सरकारी रेस्ट हाऊस में ठहरी थी। इसका बडा कम्पाउंड पेडों और फूलों से भरा हुआ था। लेकिन एक कोने में बडा सा मैदान था, जो उबड खाबड जमीन और कंटीली झाडियों वाला था, उसके अंतिम छोर पर एक बडे पेड की उंची टहनी पर दो चीले बैठी धूप सेंक रही थीं। बगल में उनका घोंसला बना हुआ था।
मैंने सोचा पास चलकर देखते हैं- मैं धीरे धीरे उस मैदान में आ गई- सावधानी से, मंथर गति से पेड की तरफ जाने लगी। दबे पांव, कि कहीं वे उड न जाएँ।
एक तीव्र आवाज सुनाई दी। तब पता नही था, अब मैं कहीं से भी वैसी आवाज सुनूँ तो जान लूँगी कि यह चील की आवाज है। एक तेज सीटी की तरह। फिर वैसी ही आवाज दूसरी दिशा से भी आई। उधर आकाश में एक चील हवा में तैर रही थीं। घोंसले से एक चील उड चुकी थी। लेकिन एक ऐसे बैठी रही कि कुछ हुआ ही न हो।
मैंने देखा कि तैरने वाली चीलों की उंचाई और गोल चक्कर का घेरा कम हो रहा है। दो चीलें और आयीं। मुझे अचानक समझ में आया कि उनके गोल चक्करों के केंद्र में मैं थी। क्या ये चीलें बेवकूफ है? क्या मैं उस उंचे पेड पर चढ सकती थी या उनके घोंसले का कुछ बिगाड़ सकती थी? फिर क्यों उन्हें मेरा संदेह हुआ?
खैर, चीलों से क्या डरना? फिर भी मेरे कदम अपने आप पीछे हटने लगे।
वेग से एक चील ने नीचे गोता लगाया और मेरे सरके थोडे ऊपर से निकल गई। दूसरी ने गोता लगाया- और भी पास से निकल गई। सन्न की आवाज मेरे कान में गूँज गई। इस बार मुझे उसकी भाषा और इरादा साफ साफ समझ में आये। वह पंख से मुझे थप्पड मारना चाहती थी। और कह रही थी- चली जाओ।
चारों ओर खुला आकाश, खुली जमीन। सबसे नजदीक पेड भी बहुत दूर था। मैं भागी उस पेड की ओर। घने विस्तार वाला आम का पेड। मैं वहाँ पहुँची। इससे पहले दो और प्रयास हो चुके थे- मुझे सजा देने के लिए।
आम के पेड के नीचे खडी मैं बडी देर तक सोचती रही, चीलों को क्या हक था मुझ पर यों संदेह करने का ! फिर समझ में आया, चीलों ने सोचा होगा कि इन आदमियों को क्या हक है हमारे घोंसले में ताँक-झाँक करने का?

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