Wednesday, August 8, 2007

१२-- आता है ऋतुराज

१२-- आता है ऋतुराज

ऋतुचक्र अपनी गतिसे घूमता है। जब बसंत आता है, तो वह अपने आगमनसे सबको अभिभूत कर देता है। कहता है - लो, रख लो खबर कि मैं आ गया हूं। हजार तरीकोंसे उसके अस्तित्वकी आहट हम तक पहुंचती है। आप आहटकी ओर ध्यान लगाये बैठे हों तब भी, या अपने कामोंमें व्यस्त रहनेका भ्रम पाल रखा हो तब भी।

बसंत के आने की बातको तूती, नगाडा, शंख, भेरीकी तरह गुंजाने वाली पहली जमात है कोयलकी। पूस, माघके ठंडे महीनोंमें इनके गलेसे 'क्वाक्‌' की एकाधही आवाज आती है। लेकिन जैसेही बसंतका पूर्वानुमान हो जाता है, तो वही क्वाक अब कुहूमें बदल जाता है और कुहूकुहूकी गुंजानसे बसंतके आगमनका स्वागत होता है। शुरूमें धीमी धीमी, नाजुक लाडभरी 'कुहू', मानों झिझक रही हो कि इन आदमियोंको सुनाऊं या ना सुनाऊँ। लेकिन अचानक उसकी गायकी रंग लाती है, आवाज पंचम तानतक पहुंच जाती है। यदि तुमने नकलमें कुहू करना शुरू कर दिया तो चिढ कर उतनी देरतक गाती रहेगी, जबतक उसे तसल्ली न हो जाए कि उसने तुम्हें परास्त कर दिया है। ऐसे सुर मेरे कानमें पडते हैं, तो मनकी किताबपर आलेख लिख जाता है कि बसंत आ रहा है।

दूसरा आलेख लिखा जाता है कुछ खास खास पेडोंसे। खासकर पीपलसे। उसके सारे पुराने पत्ते झडकर नई लाल, धानी कोंपलें आती हैं जो धूपको अपने अंग प्रत्यंगोंपर लेकर नाचती रहती हैं। यह थिरक बसन्त आनेकी सूचना देती है। वैसे तो पीपलके बडे, हरे पत्ते भी जब हवामें मचलते हैं तो समुद्रकी तरह एक गंभीर गूंज उनमेंसे निकलती है। लेकिन नई कोंपलोंकी थिरकन केवल देखी जा सकती है। दूर दूर तक। मानों हजारों छोटे छोटे शीशे धूपको विभिन्न दिशाओंमें परावर्तित कर रहे हों।

मुझे याद आता है बचपन, जो जबलपुरमें गुजरा था। तब कभी कभी पिताजी अलस्सुबर भेडाघाट घुमाने ले जाते थे। वहां देखा है नर्मदा नदीके पात्रमें थिरकते सूर्य किरणोंका चमचमाना और नदीके पात्रमें यों बहते जाना मानों हजारों हीरे जडा कोई हार बहा जा रहा हो। जब दूरसे पीपलकी नई कोंपलोंपर धूप थिरकते हुए देखती हूं तो वही नर्मदा पात्रके हार याद आते हैं और अचानक मनमें एक बोध तिर जाता है, कि लो, यह तो बसंत है।


एक बार हमारे स्कूलमें बसंतपर नृत्यप्रस्तुति करनी थी। मेरी मित्र पुष्पाकी दीदीकी एक कविता थी --
आओ हे ऋतुराज, खिला दो फूल नये उन सूखी मुरझी डालोंपर, जिनपर कोई फूल कभी भी खिले नही।
पर नृत्यके लिये यह थोडा उदासी भरा था । सो मैंने उसे बदलकर बना दिया -- आता है ऋतुराज, खिल रहे फूल नये उन सूखी मुरझी डालोंपर, जिनपर कोई फूल कभी भी खिले नही।

बसंतके आते ही ध्यान आकर्षित करने वाले जिन फूलोंकी मालिका शुरू हो जाती है, खासकर लाल फूलोंकी, उनमें सबसे पहला है सेमल। ऊंचाई छूने वाले पेड़, सारे पत्ते झड़े हुए, टहनियां आकाश की ओर उठी हुईं और एकदम ऊपरी छोर पर बडे बडे लाल जर्द फूल। सेमलका यह सौंदर्य मैंने पहली बार देखा था पुणे-मुंबईके घाटोंमें। बादमें नाशिक मुंबईके घाटोंमें देखा। तो मनने यह पहचान बनाई कि शायद यह पेड पहाडोंपर ही उगते हैं । उधर गुरूदेव टैगारने भी सेमल का वर्णन किया है - ''अपने हृदयके रक्तपुष्प आकाशको अर्पित करता हुआ सेमल।'' लेकिन दिल्ली आकर देखा कि यहांके सपाट रास्तोंपर भी कतारकी कतारमें खडे हैं सेमल! केवल लाल ही नहीं, एकाध तो केसरिया और पीले रंग में भी थे - मसलन उड़ीसा भवनके अहातेमें और न्याय मार्ग पर।

लाल फूलोंका रौब जमानेवाले पेड बसंतमें एक एक कर फूलने लगते हैं - सबसे पहले सेमल, फिर पांगारा, फिर पलाश और फिर गुलमोहर । गुलमोहरके खिलनेतक ग्रीष्म ऋतु आ चुकी होती है। यह चारों पतझडी पेड हैं अर्थात्‌ पहले इनके सारे पत्ते झड़ जाते हैं, फिर फूल खिलते हैं और पूरा वृक्ष केवल फूल ही फूल लादा इठलाता रहता हैं, फिर धीरे धीरे फूल सूखने लगते हैं, कोए या बीज भी बनने लगते हैं, तब कहीं जाकर नए पत्ते आने आरंभ होते हैं।

लाल ही फूल खिलाने वाला एक और वृक्ष है स्पैथोडिया, जो गर्मी और जाडे दोनों महीनोंमें फूलता है। लेकिन इसके गहरे हरे पत्ते झडते नहीं हैं, इसलिये फूलोंकी खूबसूरती छिप जाती है। फिर भी पुणे और बैंगलूरमें कुछ रास्तोंपर  कतारसे खड़े इनकी शोभा देखी जा सकती है।

सुन्दर लाल फूलोंपर नाज कर सके ऐसा एक वृक्ष और है - सीता-अशोक। यूं तो बिना फूलोंवाले अशोककी दो प्रजातियोंसे हमारा काफी परिचय होता है - एक ऊंची छरहरी प्रजाति जिसे होटलों और घरोंके चारों ओर सुघड़ता और सजावटके लिये लगाते हैं - या फिर पसरने वाला अशोक, जो आमकी तरह पसर कर घनी छाया देता है। लेकिन सीता-अशोक वह प्रजाति है, जिसमें लाल फूल खिलते हैं। माना जाता है कि लंकामें रावणने सीता को जिस अशोक-वाटिकामें रखवाया था, वह यही लाल फूलों वाला अशोक था। यह अत्यंत औषधि गुणोंवाला होता है जिसकी छालसे भी औषध बनते हैं। लेकिन दुर्भाग्यसे लोग असंमयपूर्वक इसकी छाल उतारते हैं और पेड मरने लगता है। इसी कारण आज यह प्रजाति नष्टप्राय हो गई है। यदि हम सब मिलकर भारी प्रयत्न करें, तब ही इसे बचाया जा सकता है।

बसंतमें पीले फूलोंका रौब भी कम नहीं होता है। सारे पत्ते गिरा कर हलदीके पीले रंगवाले फूलोंका जलवा लेकर
सबसे पहले आता है - टयूबोबिया। ठिगना पेड है - ८-१० फुटका। लेकिन पुणेमें यशदा संस्थानके बगलमें अति विशाल और ऊंचा टयूबोबियाका पेड है, जो बसंतके आते ही पीले फूलों से ''नखशिखांत '' भर जाता है। करीब एक महीने तक यह आलम टिकता है। मैं भी उसी श्रद्धा से ''दर्शन'' करने जाती हूँ- जैसे कोई खास त्योहारों पर मंदिरमें जाए। मेरे देखे हुए टयूबोबियोंमें यही सबसे खूबरसूरत है।

टयूबोबियाके बाद बारी आती है कासिद और अमलतासकी। कासिद भी गहरे हरे रंगके पत्तों वाला पेड है। इसके पत्ते बारीक बारीक होते हैं और फूल केवल टहनियोंके आखिरी छोरपर लगते हैं। बारीक पीले फूलोंमें जर्द चॉकलेटी रंगकी फुनगियाँ होती हैं। ये फूल दिन भर झरते रहते हैं और जमीन पर कालीनसी बिछा देते हैं। इसके बाद फूलते हैं अमलतास और उसके बाद कंचन।

नई दिल्लीमें अलमतास भी कतार-दर-कतार भरे पडे हैं। लेकिन कोई रहस्य है जो मैं नहीं जानती। पुणेमें अमलतासके पत्ते झड़ते हैं और पूरा पेड केवल हलदिया बना डोलता रहता है। दिल्लीमें अमलतास फूलोंके खिलनेका मौसम थोडी देरसे आता है - जब फूलोंके साथ पत्ते भी होते हैं, और वह सौंदर्य नहीं होता जो पुणेमें मैंने देखा है। हाँ, एक समानता है, अमलतासके फूल झरनेसे पहले एक अत्यंत जादूभरी सुगंध हवामें बिखेरते हैं जो दूर दूर तक जाती है। ग्रीष्मके पूरे महीनेमैं इस सुगन्धका आनंद उठा लेती हूँ। पुणेमें हमारे घरके कोनेपर लगा अमलतास मेरे देखे हुए खूबसूरत अमलतासोंमें एक है।

लाल, पीले फूलों का सौंदर्य अपनी जगह पर। लेकिन मनको पगलाने वाला एक नयन रम्य फूल है - जाकरांडा, जो ग्रीष्मके दौरान ही खिलता है। आकाशको छूती छरहरी टहनियाँ, अति बारीक हरे पत्ते, ऊपर साफ साफ नीला आकाश, और उसके रंग - लावण्यकी स्पर्धा करने वाला नीले-बैंगनी रंगके फूलोंसे भरा जाकरांडा । आँखोंको ठंडक देने वाला । इससे मेरी पहली मुलाकात हुई थी देहरादून - ऋषीकेश राष्टीय महामार्ग पर। जिस इंजिनियरने इस रास्तेके दोनोंओर सिलसिलेवार जाकरांडाकी कतारें रोपी हैं उसे मेरा सलाम ! मुझे याद आता है, कुछ वर्ष पहले किसी कंपनीका विज्ञापन देखा था - ''जाकरांडा, आय एम एन्चांटेड बाय यू।'' आज न मुझे वह कंपनी याद है, न वह बात जिसका विज्ञापन था , केवल इतना पता है कि मेरी ही तरह कोई और भी है जिसे जाकराण्डासे मोह हो गया है। एन्चाटिंग - जादू डालनेवाला। बिलकुल सही वर्णन।

बसंतकी सूचनाके लिये केवल शब्द और रंग ही नहीं, बल्कि स्पर्श और गंध भी आगे आते हैं। वासंतिक समीरके झोंके भी छुई-मुईसे चलते हैं- मंद गतिमें एक स्नेहिल गरमाहट लिये हुए। उसका स्पर्श त्वचाको छूते ही ध्यान आता है कि जाडा हो गया विदा, और आ गया वसंत। हमारे स्कूलकी एक कवितामें वसंत का वर्णन था - पवन हल्के झोंकोंके साथ चलता है, पेडों पर लाल पल्लव आ जाते हैं, बेलोंमें फूल लद जाते हैं और अमराई बौरसे मह-महाने लगती हैं, आकाश नीला नीला हो जाता है, कोयल झूमकर तान सुनाती है, यों सबके घरमें बसंत आता है और खुशियाँ लाता है।
 झुळझुळ वारे वाहू लागले लाल पालवी तरूवरी
फुलाफुलांनी भरल्या वेली आंबेराई मोहरली,
आभाळाचे निळेनिळेपण कुहूकुहू कोकिळा करी,
आनंदी आनंद गड्यांनो वसंत आला घरोघरी

तब यह केवल रट्टा लगानेकी कविता थी। लेकिन जब बसंतके एक एक चिन्हसे परिचय हुआ, तो हर बार उस कविताकी याद आई। मसलन अमराईमें आम के बौरकी महकका क्या कहना ! कहते हैं कि कामदेवके जो पाँच पुष्प-बाण हैं, उनमेंसे एक है आम्रपुष्प ! और बसंत खुद कामदेवका अतिप्रिय सखा है। इसी कारण वह जूही और चमेलीकी गंध भी ले आता है। हाँ, बेला और चंपाकी सुगंधके लिए ग्रीष्मकी प्रतिक्षा करनी पड़ती है।

यदि तुममें सुबह जल्दी उठनेका गुण है तो जिस वासंतिक सुगंधसे पहचान हो सकती है वह है कडुए नीमके महीन फूलोंकी मीठी सुगंध। मैं अपने जन्मसे लेकर पाँच वर्षकी उमर तक इसी पेड़के तले रातमें सोती थी। इसलिए यह गंध तो मेरे मनकी सबसे गहरी परतों तक रच-बस गई है। मैंने जिस-जिससे इसका परिचय कराया है, लगभग सभी इसके प्रभावसे अवाक्‌ और मुग्ध हो गए। और अपनी अनभिज्ञता से भी। बहुत कम लोगोंको मालूम है कि बबूलकी भी कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनके फूल सुगंधी होते हैं और वह भी बसंतमें खिलते हैं।

एक और वृक्ष वसंतमें फूलता है - शिरीष। इसके फूल अत्यंत महीन रेशोंके बॉलकी तरह होते हैं, जिनका हल्का सुनहरा रंग होता है। करीब २५-३० दिनोंमें यह फूल झरने लगते हैं, तो अपनी सुगंधसे वातावरणको सरोबार कर देते हैं। फिर इसमें लगती हैं चपटी, चौड़ी फलियाँ, जो पतझड़ आते-आते पककर चमकीली सुनहरी हो जाती हैं। पूराका पूरा पेड केवल चमचमाती सुनहरी फलियोंका पेड बन जाता है। हवाके झोंके आते हैं तो उसके अंदरके बीज बजने लगते हैं। इसकी एकाध फली मैं हर मौसममें जमा करती हूँ।

यह बसंत वर्णन अधूरा रह जायेगा, यदि मैं मृगशिरा नक्षत्रकी बात न कहूं । बसंतके दिनोंमें यह सूर्यास्तके समय पूरबके आकाशमें उगता है। कई बार ऑफिसके बंद कमरेमें दिन भर बैठनेके बाद, सूर्यास्तके आसपास, मैं घर लौटती हूँ। और अचानक पूरब दिशामें उदित होता हुआ मृगशिरा नक्षत्र दिख जाता है - वह जो आकाशमें सबसे विस्तृत और सबसे शोभायमान है। इसमें चार कोनोंपर चार चमकीले सितारे हैं और मध्यमें एक कतारमें एक ही आकार और चमक दमक वाले तीन सितारे,, साथही ध्यानमें आते हैं इस नक्षत्रसे दक्षिणमें व्याधका सबसे बडा चमकता सितारा, उत्तरमें रोहिणी और ब्रह्महृदय, और मृगशिरासे थोडे ऊपर पुनर्वसु नक्षत्रके चार चमकीले सितारे। फिर भलेही दिन भर कोयल और समीर और सुगंध दफ्तर ओर मनके बाहर रह गये हों, पर पूरबका यह जगमगाता मृगशिरा मेरी थकान मिटाकर मुझे एहसास करा देता है, देखो बसंत आ गया।

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